सांसदों की सैलरी में इजाफा
कैबिनेट की मंजूरी के साथ सांसदों की सैलरी में 300 पर्सेंट इजाफा होना तय है। बेसिक सैलरी के अलावा उनका कार्यालय खर्च और निर्वाचन क्षेत्र का भत्ता भी बढ़ाया गया है। हालांकि यह बढ़ोतरी इस बारे में गठित संसदीय समिति की सिफारिशों से कम है और सरकारी सचिवों के वेतन से एक रुपया ज्यादा वेतन की मांग कर रहे तमाम सांसद इससे नाखुश हैं। पर जनता को शायद यह बढ़ोतरी भी नागवार गुजरे। आम लोगों की नाराजगी सांसदों का वेतन-भत्ता बढ़ाने से नहीं, बल्कि इससे है कि जनप्रतिनिधि वेतन बढ़ोतरी का मसला खुद ही तय कर लेते हैं। इस काम के लिए सरकारी कर्मियों का वेतन तय करने वाले आयोग की तरह उनका कोई अलग प्रबंध नहीं होता है और न इस बारे में उस जनता से कोई राय-मशविरा किया जाता है, जिसके ये प्रतिनिधि हैं। खुद सरकार ने 2006 में इस तरह का कमिशन बनाने की बात कही थी, लेकिन उस पर अमल की कोई कोशिश अब तक नहीं हुई है। जनप्रतिनिधियों से लोग यह अपेक्षा भी करते हैं कि वेतन में नौकरशाहों से बराबरी करने से पहले उन्हें परफॉमेंर्स में वैसी ही क्षमता दिखानी चाहिए जैसी नौकरशाहों के संबंध में की जाती है। और चूंकि उनकी भूमिका देश व जनता के सेवक की है, इसलिए नैतिकता के मानदंडों पर खरे उतरने के साथ उन्हें यह भी साबित करना चाहिए कि कानून और प्रशासनिक पहलुओं की जानकारी के मामले में वे सरकारी सचिवों से कहीं ज्यादा श्रेष्ठ हैं। ज्यादा बेहतर यह होगा कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्तों का निर्धारण करने वाले पे कमिशन की तरह ही सांसदों- विधायकों की सैलरी के लिए भी एक आयोग बने जो एक तय अवधि में जरूरत के मुताबिक उनके वेतन-भत्ते में सुधार करे। ताकि भ्रष्टाचार रुक सके।
अमित कुमार
न्यू दिल्ली
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